नई दिल्ली: भारतीय रुपया लगातार दबाव में है और 19 मार्च 2026 को पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93 के पार फिसल गया। दिन के कारोबार में रुपया 93.24 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले दिन के मुकाबले करीब 0.65% की गिरावट है। इससे एक दिन पहले ही यह 92.63 के स्तर पर बंद हुआ था। मार्च में अब तक रुपया करीब 2% कमजोर हो चुका है। रुपए में इस गिरावट की बड़ी वजह मिडिल ईस्ट (Middle East Conflict) में बढ़ता तनाव है।
ईरान (Iran) पर ह*मलों के बाद खाड़ी क्षेत्र में तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जिससे भारत (India) जैसे बड़े तेल आयातक देश पर सीधा असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से देश में महंगाई करीब 0.5% तक बढ़ सकती है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल, एलपीजी और रोजमर्रा के कई सामान महंगे होने की आशंका है। दूसरी ओर विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भी रुपए पर दबाव बढ़ाया है।
मार्च 2026 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय बाजार से 8 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की है, जो पिछले एक साल से ज्यादा समय में सबसे बड़ी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनाए रखने से डॉलर मजबूत बना हुआ है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था कुछ हद तक इस दबाव को संतुलित कर सकती है।
रुपए की कमजोरी का सीधा असर आयात पर पड़ेगा। तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सामान महंगे हो सकते हैं। इससे आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ने की संभावना है और व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है। अगर वैश्विक तनाव और तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले समय में रुपए पर दबाव और बढ़ सकता है, जिससे महंगाई भी तेज हो सकती है।

